जल सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन हेतु काम करेगा यह केंद्र
जर्मन एकेडमिक एक्सचेंज सर्विस (डीएएडी) द्वारा स्थापित यह केंद्र जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने और जलवायु सुरक्षा की रणनीति बना कर सतत विकास का मज़बूत आधार देगा
- भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मद्रास ने ‘वैश्विक जल एवं जलवायु अनुकूलन केंद्र’ का शुभारंभ किया है। जर्मनी की एक सरकारी एजेंसी के सहयोग से स्थापित इस केंद्र का लक्ष्य जल सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन की वैश्विक चुनौतियों से निपटना है।
इस केेंद्र का मुख्य हब आईआईटी मद्रास में होगा जबकि सैटेलाइट हब एशियाई प्रौद्योगिकी संस्थान (एआईटी), बैंकाॅक में बन रहा है। इसका उद्घाटन 30 जून 2021 को एक वर्चुअल आयोजन में किया गया। इस अवसर पर आईआईटी मद्रास और जर्मन एकेडमिक एक्सचेंज सर्विस (डीएएडी) के गणमान्य लोग उपस्थित थे।
केंद्र की संरचना जर्मन एकेडमिक एक्सचेंज़ सर्विस (डीएएडी) कर रही है और इसे जर्मन इंस्टीट्यूट्स आॅफ टेक्निकल युनिवर्सीटी आॅफ ड्रेसडेन और आरडब्ल्यूटीएच आचेन युनिवर्सीटी के सहयोग से स्थापित किया जा रहा है। केंद्र का नाम ‘एबीसीडी’ (आचेन-बैंकाक-चेन्नई-ड्रेस्डन) है।
केंद्र चार प्रमुख शहरों में भौगोलिक विस्तार के साथ एक समान विषय पर कार्यरत छत्रछाया संगठन के तहत प्रमुख जर्मन और एशियाई विश्वविद्यालयों के वर्तमान नेटवर्क के रणनीतिक विस्तार का प्रतीक है।
चेन्नई में जर्मन संघीय गणराज्य की काॅन्सल जेनरल सुश्री कैरिन स्टोल ने इस अवसर पर कहा, ‘‘डिजिटाइजेशन के कई फायदे हैं जैसे कि कोविड-19 महामारी के दौर में भी इस परियोजना में विलंब नहीं होना। कोविड-19 अभी खत्म नहीं हुआ लेकिन हमें आशावादी रहना है और अवसरों का लाभ लेना है। शिक्षा के ़क्षेत्र में बहुत अवसर हैं। चेन्नई को लेकर मुझे बहुत खुशी है कि यहां आईआईटी मद्रास प्रोजेक्ट का मुख्य हब है और इसके बुनियादी स्तंभों में एक है।
सुश्री कैरिन स्टोल ने यह भी कहा, ‘‘भारत-जर्मन शैक्षिक आदान-प्रदान बहुत गहन रहा है। मुझे दो साल पहले आईआईटी मद्रास के हीरक जयंती समारोह में भाग लेने का सौभाग्य मिला। केवल चार दिन पहले जर्मनी की संसद में जलवायु संबंधी नई पहल का विधेयक पारित होने और ऐसे केंद्र का शुभारंभ करना इसका प्रमाण है कि हम सही रास्ते पर हैं और हमारा नया संघ पूरे देश और संस्थानों के बहुत-से विद्यार्थियों के लिए उपयोगी और लाभदायक होगा।
वैश्विक जल एवं जलवायु अनुकूलन केंद्र का उद्देश्य सक्षमता बढ़ाने का मंच बनना है जो उच्च शिक्षा, अनुसंधान, प्रौद्योगिकी और ज्ञान के हस्तांतरण के आगामी साझा प्रयासों को बढ़ावा देगा, एकजुट करेगा और अधिक व्यापक बनाएगा। केंद्र का नेतृत्व आईआईटी मद्रास के महासागर इंजीनियरिंग विभाग के प्रो. एस.ए. सन्नासिराज कर रहे हैं।
उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए आईआईटी मद्रास के निदेशक प्रोफेसर भास्कर राममूर्ति ने भारत, जर्मनी और थाइलैंड के प्रतिष्ठित संस्थानों के बीच इस साझेदारी की सराहना करते हुए टीयूडी जर्मनी के साथ अपने कॅरियर के शुरुआती दिनों को याद किया और अब आरडब्ल्यूटीएच, जर्मनी के साथ मजबूत सहयोग संबंध की बात कही। कथित संस्थानों के मौजूदा प्रोग्राम जैसे मास्टर और डाॅक्टोरल विद्यार्थियों के लिए आईजीसीएस, डीएएडी एक्सचेंज प्रोग्राम के साथ यह नया उद्यम विद्यार्थियों को जल सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन के क्षेत्र में नया अवसर देगा।
वर्चुअल उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए डॉ. काटजालाश, निदेशक, डीएएडी क्षेत्रीय कार्यालय नई दिल्ली और निदेशक, डीडब्ल्यूआईएच नई दिल्ली ने बताया, ‘‘जर्मनी में यह कानून पारित हो गया है कि 2045 तक देश को क्लाइमेट न्यूट्रल होना है। जलवायु परिवर्तन किसी एक देश की समस्या नहीं बल्कि वैश्विक संकट है। इसके मद्देनजर डीएएडी इस 360 डिग्री प्रोजेक्ट को बढ़ावा देने के लिए उत्साहित है। ‘‘भारत-जर्मन सहयोग संबंध भारत के भूतपूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के समय से अब तक कायम है और कथित संस्थानों के बीच नई साझेदारी की हम सराहना करते हैं जिसके तहत जल सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन पर नए मास्टर्स कोर्स शुरू किए जाएंगे और डाॅक्टोरल विद्यार्थियांे और विशेषज्ञों का आदान-प्रदान भी होगा ताकि ज्ञान और विचारों का आदान-प्रदान बढ़े जो जल संकट के हल के लिए जरूरी है।’’
‘जल सुरक्षा एवं वैश्विक परिवर्तन’ पर एक अभिनव, संयुक्त वैश्विक एम.एससी. कोर्स शुरू करने की परिकल्पना की गई है। साथ ही, संयुक्त डॉक्टोरल अनुसंधान कार्यक्रम भी शुरू किया जाएगा जिसका मकसद अंतर-अनुशासनात्मक कार्यों को बढ़ावा देकर वैश्विक भागीदारी संस्थानों की देखरेख में जल सुरक्षा समाधान के अभिनव ज्ञान का विकास करना है।
केंद्र का परिचय देते हुए प्रो. डॉ. जुर्गन स्टैम, सिविल इंजीनियरिंग के डीन फैकल्टी और सिविल एवं पर्यावरण इंजीनियरिंग स्कूल के अध्यक्ष, टेक्नीश यूनिवर्सिटी ड्रेस्डेन ने कहा, ‘‘इस केंद्र के तीन बुनियादी स्तंभ हैं - विद्यार्थियों और विशेषज्ञों के लिए एक समान शैक्षिक कार्य; पीएच. डी. प्रोजेक्ट के लिए संयुक्त शोधकार्य और ज्ञान के हस्तांतरण के कार्यों में तेजी। इन कार्यों में मदद के लिए परिहवन अनुदान दिए जाएंगे ताकि आदान-प्रदान एवं सहयोग स्थापित हो और बढ़े। हम ने पहले से मौजूद द्विपक्षीय संबंध के आधार पर यह पहल की है। हम जल सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन पर नया मास्टर प्रोग्राम शुरू करेंगे जो डिजिटल अध्यापन की सीमाओं का विस्तार करेगा जिससे पूरी दुनिया के विद्यार्थियों की भागीदारी आसान होगी।
इस अवसर पर कई अन्य गणमान्य वक्ताओं ने अपने विचार रखे जिनमें शामिल हैं प्रो. डॉ. उर्सुला एम. स्टॉडिंगर, रेक्टर, टेक्नीश यूनिवर्सिटी ड्रेस्डेन, जर्मनी; डॉ. ईडन वाई वून, अध्यक्ष, एशियाई प्रौद्योगिकी संस्थान, थाईलैंड; प्रो. डॉ. एच.सी. मल्ट; उलरिच रुडिगर, रेक्टर, आरडब्ल्यूटीएच आचेन यूनिवर्सिटी, जर्मनी; प्रो. डॉ. ताइकन ओकी, सीनियर वाइस-रेक्टर, संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय और प्रो. डॉ. मार्कस ओसेर, डीन, सिविल इंजीनियरिंग, आरडब्ल्यूटीएच आचेन यूनिवर्सिटी, जर्मनी।
पूरी दुनिया में प्राकृतिक संसाधनों की गुणवत्ता और मात्रा की स्थितियों के परिणामस्वरूप अत्यधिक परिवर्तन देखे जा रहे हैं। इसलिए हाल के दशकों में बदलते जलवायु परिदृश्य में जल की सतत उपलब्धता बड़ी चिंता बनी हुई है। इसे दूर करने के लिए पूरी दुनिया में जारी विभिन्न प्रयासों में वैश्विक जल एवं जलवायु अनुकूलन केंद्र का विशेष महत्व है क्योंकि इन चुनौतियों से निपटने में कोई वर्चुअल सीमा नहीं है।
केंद्र खुद के काम-काज में कार्बन उत्सर्जन कम करने के लक्ष्य से अंतर्राष्ट्रीयकरण जैसे उपायों पर जोर देगा। साथ ही, अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के बजाय डिजिटल संचार उपकरणों और अभिनव प्रौद्योगिकी का लाभ लेगा। केंद्र की रूपरेखा बनाने के समय से ही यह विचार अंतर्निहित रहा है और वैश्विक स्थिरता की संयुक्त प्रतिबद्धता में इसकी अभिव्यक्ति है।
वैश्विक जल एवं जलवायु अनुकूलन केंद्र की दूरदृष्टि बताते हुए इसके भारतीय समन्वयक प्रो. एसए सन्नासिराज, महासागर इंजीनियरिंग विभाग, आईआईटी मद्रास ने कहा, “वैश्विक जलवायु परिवर्तन एक ज्वलंत समस्या है इसलिए अविलंब ठोस कार्रवाई आवश्यक है ताकि मानव समाज पर मंडाराता खतरा कम हो और जलवायु संकट की भावी त्रासदी नहीं हो। यह केंद्र जलवायु परिवर्तन के संकट से बचने और जलवायु की सुरक्षा के लिए अनुकूलन की अभिनव रणनीतियां बनाएगा ताकि सतत विकास का मजबूत आधार तैयार हो।’’
प्रो. सन्नासिराज ने यह भी बताया, ‘‘आईआईटी मद्रास का साझेदार संस्थानों के साथ एक शक्तिशाली वैश्विक और क्षेत्रीय नेटवर्क है जो उल्लेखनीय अंतरराष्ट्रीय गतिविधि, संवाद और विचार के आदान-प्रदान में सक्षम है। इसका मकसद वैश्विक जल एवं जलवायु अनुकूलन केंद्र के लिए लाभदायक नेटवर्क और अत्याधुनिक अनुसंधान सुविधाओं का उपयोग करना है। यह केंद्र खास कर आईआईटी मद्रास की हाइड्रोडायनामिक, वेव और मॉर्फो-डायनामिक्स मॉडलिंग क्षमताओं को बढ़ाने में बड़ा योगदान देगा।
आईआईटी मद्रास तटीय प्रदेश की बुनियादी व्यवस्था के अनुकूलन और पुनर्वास के प्रयासों में विशेषज्ञता रखता है जिसे बढ़ाने में इस केंद्र की पूरक भूमिका होगी। इसके अतिरिक्त क्षेत्रीय सामाजिक ढांचे की कमजोरी और जोखिम के आकलन से योजनाकारों को यह अवसर मिलेगा कि नीति निर्माताओं के संग ठोस निर्णय लें।
वैश्विक जल एवं जलवायु अनुकूलन केंद्र ‘सतत विकास का एजेंडा 2030’ पूरा करने के लक्ष्य से हमारे ग्रह का पतन रोकने के लिए व्यापक लक्ष्यों पर काम करेगा। साथ ही, संसाधनों के स्थायित्व पर जोर देगा। सतत विकास के लक्ष्य (एसडीजी)रु 6 का उद्देश्य ‘सभी के लिए जल और स्वच्छता की उपलब्धता और स्थायित्वपूर्ण प्रबंधन’ सुनिश्चित करना है। इसलिए केंद्र का प्रयास सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय पहलुओं को बारीकी से समझने के लिए इनके बीच परस्पर संबंधों पर विचार करना होगा।’’
परियोजना के भागीदारों की यह आम राय है कि वैज्ञानिक समाधान और वैश्विक नवाचार के नेटवर्क स्थानीय और वैश्विक भागीदारों से संवाद करते हुए मिल कर काम करें। इसलिए केंद्र का लक्ष्य अंतर- और अंतःविषय मंच बनने का है जिस पर जल सुरक्षा और जलवायु अनुकूलन पर केंद्रित विज्ञान आधारित वैश्विक संवाद और विचारों का आदान-प्रदान आसान हो। अंतःविषयी दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति एक जीवित प्रयोगशाला की धारणा में की गई है जिसमें समाज के भागीदारों के साथ संवाद की सुविधा होगी।
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